
31 जुलाई 1966 को प्रेम रावत जी ने अपने दिवंगत पिता के शांति प्रयास को जारी रखने की जिम्मेदारी संभाली। इस ऐतिहासिक अवसर की 53वीं वर्षगांठ पर इंदिरा गाँधी इंडोर स्टेडियम, दिल्ली में हुए प्रोग्राम की वीडियो एवं ऑडियो रिकॉर्डिंग का आनंद लें। जन्म और मृत्यु के बीच जीवनदायनी अनमोल स्वांस के बारे में प्रेम रावत जी का अद्वितीय दृष्टिकोण सुनें।

एक झलक:
जबतक तुम अपने आपको नहीं जानोगे कि तुम कौन हो, तुम्हारी क्या शक्तियां हैं, ‘‘भगवान! मेरे लिए ये कर दे! भगवान! मेरे लिए ये कर दे! भगवान! मेरे लिए ये कर दे!’’ इनसे नहीं। ये जानो, उस भगवान ने तुम्हारे लिए पहले से ही क्या कर दिया है। तुमको ये स्वांस दिया है।
अपने आपको कभी ये मत समझना कि तुम भाग्यशाली नहीं हो, क्योंकि वो स्वांस — जबतक तुम्हारे अंदर वो स्वांस आ रहा है, जा रहा है, उस परमेश्वर की तुम पर कृपा है! और तबतक, जबतक ये स्वांस आ रहा है, जा रहा है, यम भी तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता।
- प्रेम रावत - रांची, झारखण्ड

एक झलक:
जबतक तुम अपने आपको नहीं जानोगे कि तुम कौन हो, तुम्हारी क्या शक्तियां हैं, ‘‘भगवान! मेरे लिए ये कर दे! भगवान! मेरे लिए ये कर दे! भगवान! मेरे लिए ये कर दे!’’ इनसे नहीं। ये जानो, उस भगवान ने तुम्हारे लिए पहले से ही क्या कर दिया है। तुमको ये स्वांस दिया है।
अपने आपको कभी ये मत समझना कि तुम भाग्यशाली नहीं हो, क्योंकि वो स्वांस — जबतक तुम्हारे अंदर वो स्वांस आ रहा है, जा रहा है, उस परमेश्वर की तुम पर कृपा है! और तबतक, जबतक ये स्वांस आ रहा है, जा रहा है, यम भी तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता।
- प्रेम रावत - रांची, झारखण्ड

एक झलक:
जिस मिट्टी पर तुम बैठे हो, उस मिट्टी के तुम बने हो। जिस मिट्टी को तुम धोते हो, उस मिट्टी के तुम बने हो।
जिस मिट्टी से तुमको नफरत है, उस नफरत से तुम बने हुए हो। उसी मिट्टी से तुम बने हुए हो। जिसमें तुम अंतर देखते हो, उसमें अंतर है नहीं।
तो ये मिट्टी किसी वजह से आज बोलती है, सुनती है, देखती है, सूंघती है। ये मिट्टी खाना भी बनाती है और ये मिट्टी खाना भी खाती है। और ये मिट्टी खाना नहीं बनाती है, सिर्फ खाना ही नहीं बनाती है, ये मिट्टी तो उस गेहूं को लेकर पूरी भी बनाती है, परांठें भी बनाती है। रोटी भी बनाती है, फुलका भी बनाती है। ये ऐसी-वैसी मिट्टी नहीं है। ये बहुत कुछ करती है। ये शांति का पात्र भी बन सकती है और यह अशांति का कारण भी — तुम्हारी ही जिंदगी के अंदर अशांति का कारण भी बन सकती है। बात यह है सबसे पहला निर्णय तो तुमको यह लेना है, तुम अपने जीवन में चाहते क्या हो ?
- प्रेम रावत, खारघर, मुंबई

एक झलक:
जिस मिट्टी पर तुम बैठे हो, उस मिट्टी के तुम बने हो। जिस मिट्टी को तुम धोते हो, उस मिट्टी के तुम बने हो।
जिस मिट्टी से तुमको नफरत है, उस नफरत से तुम बने हुए हो। उसी मिट्टी से तुम बने हुए हो। जिसमें तुम अंतर देखते हो, उसमें अंतर है नहीं।
तो ये मिट्टी किसी वजह से आज बोलती है, सुनती है, देखती है, सूंघती है। ये मिट्टी खाना भी बनाती है और ये मिट्टी खाना भी खाती है। और ये मिट्टी खाना नहीं बनाती है, सिर्फ खाना ही नहीं बनाती है, ये मिट्टी तो उस गेहूं को लेकर पूरी भी बनाती है, परांठें भी बनाती है। रोटी भी बनाती है, फुलका भी बनाती है। ये ऐसी-वैसी मिट्टी नहीं है। ये बहुत कुछ करती है। ये शांति का पात्र भी बन सकती है और यह अशांति का कारण भी — तुम्हारी ही जिंदगी के अंदर अशांति का कारण भी बन सकती है। बात यह है सबसे पहला निर्णय तो तुमको यह लेना है, तुम अपने जीवन में चाहते क्या हो ?
- प्रेम रावत, खारघर, मुंबई

एक झलक:
आप जानते हैं कि आपमें क्या-क्या चीज अच्छी नहीं हैं। आप जानते हैं कि आपमें क्रोध है। क्रोध बाहर से नहीं आता है। क्रोध आपके अंदर से आता है और जहां आप जाते हैं, आपका क्रोध आपके साथ जाता है। आपका संशय भी आपके साथ जाता है। परंतु जैसे सिक्के का एक side नहीं हो सकता। एक तरफ अंधेरा है तो दूसरी तरफ उजाला है। एक तरफ अगर doubt है तो दूसरी तरफ clarity है। एक तरफ अगर anger है तो दूसरी तरफ compassion है। इन सारे attributes को आप जानते हैं ये आपके अंदर है। जब आपको कहीं गुस्सा होना पड़ता है तो ये थोड़े ही है कि वो एस.एम.एस. के रूप में आपके फोन में आता है ? नहीं! वो तो आपके अंदर है! कहीं भी। पर क्या आप जानते हैं कि उसके दूसरी तरफ क्या है ? उस गुस्से के दूसरी तरफ compassion है। पर हम अपने जीवन में इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते हैं।
- श्री प्रेम रावत